Thursday, November 22, 2018

زينيت بطرسبورغ ينجز مهمته أمام كريليا سوفيتوف

خرج فريق زينيت بطرسبورغ بفوز ثمين من ملعب مضيفه كريليا سوفيتوف بهدف وحيد في اللقاء الذي جمعهما اليوم الاثنين، وذلك ضمن منافسات الجولة الـ 12 من الدوري الروسي الممتاز لكرة القدم.
ويعود الفضل في انتصار فريق العاصمة الشمالية للاعبه الأرجنتيني لياندرو باريديس، الذي أحرز هدف الفوز الوحيد له، في الدقيقة 22 من زمن الشوط الأول للقاء، الذي أقيم على ملعب "سمارا أريناواستعاد زينيت بطرسبورغ توازنه بعد هزيمته في الجولة الماضية خارج أرضه أمام دينامو موسكو بهدف وحيد أيضا، ليرفع رصيده إلى 28 نقطة، ويبتعد في صدارة الدوري بفارق 6 نقاط عن وصيفه كراسنودار.
في حين توقف رصيد كريليا سوفيتوف، عند 11 نقطة، ويشغل المركز الرابع عشر على سلم الترتيب
افتتح في ولاية "أتر برديش" الهندية أول مستشفى لمعالجة الفيلة، التي تعد من أكبر الثدييات على سطح الكرة الأرضية.
وذكرت "abc  "، أن السكان المحليين والمدافعين عن حقوق الحيوان متفائلون جدا بظهور أول مركز بيطري لعلاج الفيلة، فقد وصلت بالفعل أولى الحالات المرضية لهذا المستشفى التخصصي وتم علاجهاوأشارت وسائل إعلام إلى أن هذا المستشفى سيصبح من أهم معالم الجذب السياحي في البلاد، نظرا لندرته.
يذكر أن مستشفى الفيلة جهز بأحدث المعدات الطبية، وأجهزة تصوير الأشعة فوق الصوتية، وماسحات الأشعة السينية، وأجهزة خاصة لرفع الفيلة المريضة الثقيلة.
كما زودت المستشفى أيضا بكاميرات مراقبة خاصة لمتابعة حالة الحيوانات المريضة في الظلام.
وعلى الرغم من أن الفيلة تحتل مكانة مهمة في الثقافة الهندية، إلا أن الكثير من هذه الحيوانات يتعرض للصيد والتسمم والحوادث المختلفة
أظهرت أبحاث حديثة أن اللبان قد يصبح يوما ما جزءا رئيسيا في علاج التهاب المفاصل
ووفقا للباحثين من جامعة ألاباما، فإن المركبات الموجودة داخل الراتنجات التي تجمع من لحاء أشجار اللبان أو البوسويلية في إفريقيا وآسيا، يمكن أن توقف الالتهاب.
ومن المعروف أن الراتنج أو الصمغ، كان يستخدم منذ آلاف السنين كعلاج للجروح والالتهابات، وقد وجد الباحثون أن المركبات الموجودة بداخله يمكن أن تعلق نفسها بالبروتينات المسببة للالتهاب، مثل التهاب المفاصل، وتمنعها بشكل فعال.
إقرأ المزيد
ما هي مخاطر زيادة شرب الماء على الصحة؟
ويعتقد العلماء أن أشجار اللبان تنتج هذه المركبات على أنها حماية ضد الحشرات أو الفطريات.
وقال البروفيسور ويل سيتزر، الذي شارك في الأبحاث، إن هذه النتائج قد تساعد شركات الأدوية على تطوير عقاقير جديدة لمكافحة التهابات المفاصل التي تصيب على سبيل المثال أكثر من 10 ملايين شخص في المملكة المتحدة.
وأوضح سيتزر أن المشكلة الرئيسية في إنتاج دواء جديد تكمن بتحديد كيفية جعل هذه المركبات متاحة للبشر، حيث أن "اللبان غير قابل للذوبان في الماء، لذا فمن الصعب إدخاله إلى مجرى الدم".
لكن شركة " " للتكنولوجيات الحيوية، تمكنت من تطوير منتج تدعي أنه يتغلب على هذه المشكلة.
وأضافت أن الجمع بين اللبان وليسيثين الصويا (وهو أحد المواد المكونة لمجموعة من المواد الدهنية الصفراء البنية التي توجد في الأنسجة الحيوانية والنباتية)، يعزز المكونات النشطة للنبتة في المعدة مما يمكنها من الوصول إلى الدم.
وقالت الدكتورة ميريام فيرير، وهي عالمة بيولوجيا جزيئية لدى الشركة: "لقد أظهرنا أن هذا المكون يتيح وصول اللبان إلى المكان الذي يحتاج إليه لإنتاج التأثير المضاد للالتهاب، وهذا أمر مثير للغاية"

Tuesday, November 6, 2018

हिंदू-मुसलमान नफ़रत की धीमी आंच पर उबलता बिहार

हार का सीतामढ़ी शहर. दशहरे की धूमधाम के बाद 20 अक्तूबर को दुर्गा की एक प्रतिमा विसर्जन के लिए ऐसे इलाक़े से ले जाई जाने लगी जहां से उसे जाने की अनुमति नहीं थी क्योंकि प्रशासन उस इलाक़े को संवेदनशील मानता है.
विसर्जन जुलूस पर पथराव की ख़बर आई और फिर प्रतिमा विसर्जन के लिए दूसरे रास्ते से ले जाई गई. लेकिन इसकी सूचना जैसे ही शहर के अन्य हिस्सों में फैली, बड़ी संख्या में लोगों ने उस मुहल्ले पर हमला कर दिया.
दोनों तरफ़ से पथराव हुआ. पुलिस ने मामले में दखल दिया. कर्फ़्यू लगाया गया, इंटरनेट बंद कर दिया गया और पुलिस ने दावा किया कि उसने जल्द ही स्थिति पर नियंत्रण कर लिया.
लेकिन इन सबके बीच लौटती भीड़ ने 80 साल के एक बुजुर्ग ज़ैनुल अंसारी को पीट-पीट कर मार डाला. यही नहीं सबूत मिटाने के लिए लाश को जलाने की कोशिश की गई.
पुलिस को अधजली लाश बरामद हुई. सीतामढ़ी के पुलिस अधीक्षक विकास बर्मन ने बीबीसी को बताया, "इस घटना के बाद असामाजिक तत्वों ने शव को लकड़ी डालकर जलाने की कोशिश की. बाक़ी तो जाँच में पता चलेगा." पुलिस ने इस मामले में 38 लोगों को गिरफ़्तार किया है.
ये है आज का बिहार. क़रीब तीन दशक पहले, 1989 में भागलपुर में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. उस हिंसा में 1100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. लेकिन इसके बाद लंबे समय तक बिहार में इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर सांप्रदायिक हिंसा देखने को नहीं मिली.
जब से नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ दूसरी बार गठबंधन करके 2017 में सरकार बनाई है, स्थितियाँ बदल गई हैं. इस साल रामनवमी के आसपास कई ज़िलों में हिंसा हुई थी, इन्हीं में से एक था औरंगाबाद.
इस शहर के नवाडीह इलाक़े में एक संकरा रास्ता नईम मोहम्मद के घर तक जाता है. टूटे-फूटे घर और अस्त-व्यस्त कमरे में बेड पर बैठे नईम मोहम्मद बात करते-करते फूट-फूट कर रो पड़ते हैं. कहते हैं- भीख मांगकर खा रहे हैं और भीख मांगकर इलाज करा रहे हैं. वो कहते हैं कि उनके शहर ने पहले कभी ऐसा नहीं देखा जो इस साल रामनवमी के दौरान हुआ.
भीड़ आक्रामक थी, ग़ुस्से में थी. नारेबाज़ी कर रही थी, हाथों में तलवारें थी और आंखों में नफ़रत. प्राइवेट एम्बुलेंस चलाने वाले नईम मोहम्मद जब खाने के लिए घर जा रहे थे तो एक गोली आकर उन्हें लगी.
ठीक-ठाक ज़िंदगी बसर करने वाले नईम मोहम्मद अब चल-फिर नहीं पाते. वो पूछते हैं- "हमारी क्या ग़लती थी. गोली हमें ही क्यों लगी. हमारा परिवार कैसे चलेगा. हमारी ज़िंदगी कैसे कटेगी".
स साल रामनवमी के आसपास बिहार के कई ज़िलों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुईं. उस बात को सात महीने हो चुके हैं. औरंगाबाद के अलावा नवादा, भागलपुर, मुंगेर, सिवान, रोसड़ा और गया जैसे कई शहरों में हिंसा हुई.
दुकानें लूटी गईं. दुकानें जलाई गईं, इनमें से ज़्यादातर दुकानें मुसलमानों की थीं. नारेबाज़ी हुई, पाकिस्तान जाने के नारे लगे, टोपी उतारने के नारे लगे, वंदे मातरम और जय श्रीराम के नारे लगे, मुस्लिम इलाक़ों में हिंदुओं के धार्मिक जुलूस पर पथराव भी हुए.
बिहार में पहली बार ऐसा हुआ, जब एक साथ इतने ज़िले सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आए.
बिहार के औरंगाबाद में ईदगाह की ज़मीन पर बजरंग दल का झंडा लगा दिया गया. जुलूस को उस ओर मोड़ने की कोशिश की गई जहां घनी मुसलमान आबादी थी. भड़काऊ नारे लगाए गए और बड़ी संख्या में लोग तलवार लेकर सड़कों पर उतरे. चुन-चुन कर मुसलमानों की दुकानें जलाई गईं.
इसी तरह, नवादा में मूर्ति तोड़ने और पोस्टर फाड़ने के आरोपों के साथ तनाव शुरू हुआ. वहीं, रोसड़ा में स्थानीय जामा मस्जिद पर हमला हुआ और मस्जिद पर भगवा झंडा फहरा दिया गया. आरोप है कि चैती दुर्गा विसर्जन के समय मूर्ति पर एक मुसलमान घर से चप्पल फेंकी गई. फिर पथराव, तोड़फोड़ और आगज़नी हुई.
भागलपुर में 'हिंदू नववर्ष' को लेकर रैली निकली, हिंदू नववर्ष पर रैली निकालने का चलन बिल्कुल नया है. इस रैली में नफ़रत फैलाने वाले नारे लगे, नारेबाज़ी हुई और तलवार लेकर जयघोष हुआ. पत्थरबाज़ी हुई, दुकानों को लूटा गया और कई दुकानों में आग लगा दी गई.
इन सभी इलाक़ों में बीजेपी, विहिप और बजरंग दल से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं. औरंगाबाद में बीजेपी नेता अनिल सिंह जेल गए और रिहा हुए तो ज़िला उपाध्यक्ष बना दिए गए. नवादा में तो सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पर ही लोगों को भड़काने के आरोप हैं, हालांकि वो इन आरोपों से इनकार करते हैं.
जब दंगा भड़काने के आरोप में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नेताओं की गिरफ़्तारी हुई तो गिरिराज सिंह उनसे मिलने जेल तक चले गए. इस पर काफ़ी विवाद भी हुआ.
भागलपुर में केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत चौबे पर आरोप है कि उन्होंने उस जुलूस का नेतृत्व किया था, जिसके बिना अनुमति मुसलमान बस्ती में घुसने के बाद हिंसा भड़की. अर्जित शाश्वत जेल भी गए.
भागलपुर के सामाजिक कार्यकर्ता उदय कहते हैं, "हर जगह एक जैसा पैटर्न था. एक साथ तलवार लेकर दौड़ते लोग, डीजे पर बजते घृणा फैलाने वाले गाने और नए-नए बहाने से जुलूस निकालना और उसे मुसलमान बहुल इलाकों में ले जाना. हनुमान जी का झंडा लाल से भगवा हो गया. ये हर जगह एक जैसा कैसे हो गया. इसका मतलब है कि इसकी प्लानिंग की गई थी. पूरे बिहार में यही देखने को मिला."
इन सभी जगहों पर रामनवमी और अन्य जुलूसों में डीजे पर भड़काऊ गाने बजाए गए, जिन्हें पूरी तैयारी के साथ स्टूडियो में रिकॉर्ड कराया गया है. गानों के बोल कुछ ऐसे हैं, 'टोपी वाला भी सर झुका के जयश्री राम बोलेगा...'
उदय कहते हैं, "रामनवमी की घटनाओं से हम लोगों को लगा कि एक गाना दंगा करा सकता है. गीत भी दंगाई हो सकता है, इसकी तैयारी दो वर्षों से चल रही थी. ऐसी उत्तेजक आवाज़ दूर-दूर तक लोगों तक पहुँचती थी. इसका प्रयोग बड़े पैमाने पर रामनवमी के दौरान किया गया. आक्रमण की मुद्रा में जयश्री राम का नारा लगाया जाता था."
बिहार में रामनवमी के समय हुई हिंसा के बाद एक स्वतंत्र फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी ने प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया था. कमेटी का कहना है कि पूरे बिहार में एक ही पैटर्न पर हिंसा हुई. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में तलवारों की ऑनलाइन ख़रीद का ज़िक्र किया था.